अलग-अलग छावनियों की स्थापना के पीछे, समय-समय पर विधमान सैन्य तथा राजनैतिक परिस्थितियां एवं ऐतिहासिक जरुरतों के साथ-साथ कुछ एक अन्य कारण भी रहे हैं । उदाहरण के तौर पर सिकंदराबाद छावनी की स्थापना, हैदराबाद के निजाम की स्थानीय प्रतिपक्षों के उसकी सेनाओं के विरुध रहने के कारण, उसे सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी, जबकि लखनऊ छावनी की स्थापना, अवध के नवाब पर दवाब बनाये रखने तथा अंत में उसके राज्य को कब्जाने के उद्देश्य से हुई थी । इसी तरह से ब्रिटिश सेनाओं की ठंडे जलवायु की जरुरतों तथा दोआबा क्षेत्र में युद्ध की कूटनीतियों के चलते, पहाड़ों पर बसी छावनियों तथा आधुनिक उत्तर प्रदेश में स्थित छावनियों की स्थापना हुई है ।

 तथापि, स्थानीय कारणों के अतिरिक्त, छावनियों की स्थापना किये जाने के मुख्य कारण विदेशी शासकों के शासन के रखरखाब, समेकितिकरण तथा स्थापना के परिपेक्ष में विभिन्न युद्धनीतियों के मद्देनजर, सैन्य शिविरों की आवश्यकता भी रही है ।

 ब्रिटिश सेनाओं में मलेरिया, डायरिया तथा मैथुन से होने वाली अन्य बीमारियों के फैलने के कारण भी यह आवश्यक हो गया था कि इन सैन्य शिविरों में सैनिकों को, पृथ्कीकरण के उदेश्य से आम नागरिकों से अलग रखा जाए । ब्रिटिश सरकार के 19वीं शताब्दि के अभिलेख यह दर्शाते हैं कि सेनाओं का स्वास्थ्य एवं स्वच्छता उस दौर के शासकों के लिए बहुत बड़ा सरोकार था । इस के अलावा विदेशी शासकों के बाहरी देशों एवं उच्च वर्ग से संबंधित होने सोच व अपने आपको स्थानीय आबादी से दूर रहने की प्रवृति ने उन्हें अपने आप को इन छावनियों में अलग-थलग रखा तथा यह प्रवृति आज भी कायम है ।

यद्पि बहुत सी छावनियां 19वीं शताब्दि में स्थापित हुईं, किंतु वर्तमान स्थिति की सिविल एवं सैन्य प्रशासन की विशेषताएं, जो आज देश भर में फैली 62 छावनियों में देखने में आतीं हैं, को प्राप्त करने में लगभग पच्चतर वर्ष का समय लगा । 

छावनियों के प्रशासन को मार्गदर्शन प्रचलित अस्थाई नियमों से मिला, जिससे स्थानीय प्रशासन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर अस्थाई नियम व व्यवस्थाएं विकसित हुईं । पहले सिविल तथा सैन्य प्रशासन के प्रभारी कमान अधिकारी होते थे । सिविल कार्यों में कमान अधिकारी की सहायता के लिए सिविल कर्मचारियों का एक समूह जैसेकि सफाई निरीक्षक, अधिशासी अभियंता तथा सिविल शल्य-चिकित्सक (सर्जन) होता था । कमान अधिकारी को सिविल तथा आपराधिक प्रकृति से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों में जिला मैजिस्ट्रेट से परामर्श भी करना होता था ।  

 

अनाऔपचारिक परामर्शों की इस प्रक्रिया के मद्देनजर वर्ष 1864 के अधिनियम XXII के द्वारा छावनी समिति नाम  से एक स्थाई संस्था गठित कर इसे कानूनी दर्जा गया । ब्रिटिश सरकार द्वारा छावनी के प्रशासन में उस समय तक जारी प्रचलित अस्थाई नियमों पर इस अधिनियम के माध्यम से विराम लगाने का यह पहला प्रयास था । इससे छावनी के प्रशासन में छावनी समिति एवं छावनी मैजिस्ट्रेट (वर्तमान के मुख्य अधिशासी अधिकारी) जैसी व्यवस्थाओं के कारण छावनियों को विधिक स्थान प्राप्त हुआ । इस प्रावधान से छावनी समितियों को नगरपालिका के कार्यों के कारण छावनी परिषदों में प्रशासन करने व इन्हें नियंत्रित करने संबंधी शक्तियां प्राप्त हुईं ।    

परिणाम स्वरूप, इस व्यवस्था के कारण कुछ उल्लेखनीय परिवर्तन हुए जैसेकि पूरी तरह से कार्यालयी निकाय, छावनी परिषदें अब लोकतांत्रिक प्रकृति की संस्था में विकसित हुई, जिनमें चुने गए सदस्य सम्मिलित हुए । इससे भी महत्वपूर्ण यह कि परिषदें अपने नियामक एवं नगरपालिका के प्रशासक के साथ-साथ छावनियों में अब प्रमुख विकास एजेंसी की भूमिका निभा रहीं थीं ।  

यह समितियां, सभी 62 छावनियों में वर्तमान में विकसित हुए आधुनिक परिवर्तन की वास्तविक अग्रदूत थीं । वर्ष 1947 में अंग्रेजों के भारत से चले जाने के बाद, सत्ता में आईं शासनपद्धति के माध्यम से सिविल एवं सैन्य क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन हुआ तथा निरंतरता के तत्व छावनी परिषदों में अभी भी दिख रहे हैं । छावनी परिषदें, छावनियों के ब्रिटिश शासन काल के पूर्व 150 वर्षों में विकसित हुए विशिष्ट स्वरूप को बनाये रखने में भी सहायक रहीं हैं । छावनियों की विशिष्टता मुख्यता छावनी अधिनियम, 1924 है, जिसके तहत छावनी परिषदें अब तक नियंत्रित होती रहीं हैं, जिसमें 19वीं शताब्दि में प्रचलित एवं व्यवहरित नियम तथा विनियम पूर्ण रूप में समाहित हैं ।

 “छावनी परिषद जम्मू ऐसे ही 62 निकायों में से एक निकाय है, जो छावनी अधिनियम के नियमों में वर्णित दायित्वों जैसेकि भूमि प्रबंधन, प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक जल-आपूर्ति, सफाई, नालियों की व्यवस्था एवं नगरपालिका प्रशासन से संबंधित सभी तरह के कार्य करतीं हैं ।

 यह एक स्वायत्त निकाय है जो अपनी आय, कर (टैक्स) तथा गैर-कर (नॉन-टैक्स) दोनों माध्यमों से पैदा करने तथा अपना बजट तैयार करने एवं एक सीमा में लोक कल्याण की विभिन्न मदों पर, जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, उत्तरी कमान, उधमपुर द्वारा प्रदान की गई स्वीकृति अनुसार व्यय करने के लिए अधिकृत है । परिषद् वित्तीय रूप में सदृड़ है तथा इसे किसी बाहरी सहायता अथवा अनुदान की आवश्यकता नहीं है । इसका क्षेत्राधिकार जम्मू छावनी में 4600 एकड़ भूमि पर है जिसमें लगभग 22000 जनसंख्या निवास करती है ।